दुबई तक चिंता में है लोग, आखिरकार क्यों भारतीय पेरामिलिट्री जवान खुद मर रहे हैं?


दुबई की एक मशहूर समाचार ऐजेंसी "ALARABIA" ने भी भारत की पेरीमिलिट्री की दुर्दशा को देखते हुए, अपनी रिसर्च कर डाली, कि आखिरकार क्यों भारत के पेरामिलिट्री के जवान आत्महत्या करने पर मजबूर हो गए हैं।

समाचार द्वारा लिखे गए लेख का हिन्दी वर्णन कुछ इस प्रकार से हैः-


भारतीय अर्धसैनिक सैनिक आखिर  खुद को क्यों मार रहे हैं

भारतीय अर्धसैनिकों की मृत्यु सबसे ज्यादा  जम्मू.कश्मीर ,छत्तीसगढ़ या उत्तर.पूर्व में कार्रवाई में मारे जाने की तुलना में आत्महत्या के द्वारा ज्यादा पाई गई है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का दावा है कि सैनिकों का कल्याण इसकी शीर्ष प्राथमिकताओं में से एक है परन्तु आँकड़े बताते हैं कि सरकार ने अपने सांसदों के वेतन और भत्ते बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिया है। बजाय इसके कि अर्धसैनिक बलों की प्राथमिकताओं पर ध्यान देने की।

गृह मंत्रालय द्वारा संसद के समक्ष पेश की गई नवीनतम जानकारी से पता चलता है कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीआरपीएफ, सीमा सुरक्ष बल, बीएसएफ, केंद्रीय औधोगिक सुरक्षा बल, सीआईएसएफ, सीमा राष्ट्र बल, एसएसबी, और इंडो तिब्बती सीमा पुलिस, आईटीबीपी में पिछले छह वर्षों में 700 पैरा सैनिकों ने अपनी मौत का रास्ता खुद चुना। सिर्फ सीआरपीएफ में 2012 से अभी तक 189 पुरुष सैनिकों में आत्महत्या की जबकि इसके अपेक्षा 175 सैनिक कार्रवाई में मारे गए।

संसद के निचले सदन में रखी गई आंकड़े और भी चैंकाने वाली कहानी कहती है गैर अधिकारियों के लिए अधिकारियों के शब्द ही दुश्मन की गोली के अपेक्षा ज्यादा जीवन को छीनने के बारे में बताते है। एसएसबी के कार्रवाई में मारे गए अनुपात में 1/8 आत्महत्या है जो सबसे अधिक है।

एक और खतरनाक प्रवृत्ति स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का रास्ता चुनने वाले सैनिकों की बढ़ती संख्या है। बेहतर नौकरियों की तलाश में करीब 9000 अर्धसैनिक बल सालाना बाहर निकलते हैं। संसद में प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक, पैरा.सैनिक अकेलेपन के कारण आत्महत्या कर रहे हैं, विशेष रूप से अधिकारियों द्वारा उनके परिवारों की यात्रा के लिए छुट्टी से इनकार करने के कारण।

इसके अलावा, वे युद्ध क्षेत्र में अंतिम छोर पर रहते हैं और उनके लिए शांति स्थापित जगहो पर पोस्टिंग दुर्लभ हैं। उनके लिए तनाव, भोजन की गुणवत्ता और रहने की स्थिति तथा अन्य कारण हैं आत्महत्या के लिए। 2009 से 2014 तक गृह सचिव रहे पिल्लई के मुताबिक आत्महत्या का प्राथमिक कारण तनाव है।

सेना के विपरीत सीएपीएफ में एक कठिन पोस्टिंग के बाद शांति स्थापित जगहों पर पोस्टिंग नहीं मिल पाता है। सेना में जवान अपने शांति स्थापित जगहों पर परिवार के साथ रह सकता है। परन्तु इसके विपरीत सीएपीएफ में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि उन्हें हार्ड पोस्टिंग के बाद एक शांत जगह पर पोस्टिंग मिल जाए।

पिछले महीने संसद में एक और चिंताजनक बयान गृह राज्य मंत्री हंसराज अहिर ने दिया उनका कहना था कि तीन राज्य जो कि माओवादी प्रभावित है छतीसगढ़, झारखण्ड, महाराष्ट्र में दिल के दौरे , मलेरिया और डेंगू जैसे अन्य बीमारियों के साथ - साथ आत्महत्या में भी माओवादी विरोधी अभियान की तुलना में 15 गुना अधिक सैनिक मारे जाते है।

दुर्भाग्यवश, गैर.परिचालन पैरा.सैन्य मौतों के फैसले के मुख्य कारणों को संबोधित करने के बजाय बीजेपी सरकार ने लड़कों के मनोबल को बनाए रखने और अपने थके हुए दिल में जीवन के लिए प्यार को फिर से उत्तेजित करने के लिए योग पर जोर मारा है। यह कितना कारगर होगा यह तो वक्त ही बताएगा।

 हमें किसी जवान के शहीद हो जाने पर (नोटः- मीडिया द्वारा आज भी पेरामिलिट्री में जान गवाएं हुए कार्मिक को शहीद कहती है, लेकिन आज तक वह दर्जा भारतीय पेरामिलिट्री को नहीं मिला है) हमें बिल्कुल भी न्यूज लिखते हुए खुशी नही होती है, और यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है भारत के लिए, कि अब विदेश में भी भारतीय पेरामिलिट्री के जवानों की आत्महत्या का मामला आम सा हो गया है.

अब जरुरत है, भारतीय सरकार को, कि पेरामिलिट्री को उच्च दर्जा मिलना चाहिए, नही तो कोई फर्क नहीं उस शहर के ऐयर कंडीशनर में बैठकर नौकरी करने का और हमारे जवानों क्योकि दोनो ही हालत में यह दोनो सिविल कर्मचारी हैं।



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